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 प्रार्थना आत्मा का नैवेद्य है : प्रा. मिलिंद जोशी

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पुणे : “प्रार्थना का विस्तार आत्मकल्याण से लेकर विश्वकल्याण तक है। अंतर्मन को समृद्ध करना और आत्मबोध के द्वार खोलना ही प्रार्थना का उद्देश्य है। प्रार्थना आत्मा का नैवेद्य है,” ऐसा प्रतिपादन प्रसिद्ध लेखक, वक्ता तथा महाराष्ट्र साहित्य परिषद के पूर्व कार्याध्यक्ष प्रा. मिलिंद जोशी ने किया।
वे वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत द. वैद्य द्वारा लिखित तथा मिहाना पब्लिकेशन्स द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह ‘प्रार्थना’ के लोकार्पण समारोह में बोल रहे थे। उद्यानप्रसाद कार्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में संसद रत्न सांसद प्रा. डॉ. मेधाताई और प्रा. मिलिंद जोशी ने प्रार्थना कविता संग्रह का विमोचन किया

इस अवसर पर प्रा. मिलिंद जोशी, सांसद डॉ. मेधाताई कुलकर्णी, लेखक सूर्यकांत द. वैद्य, सुहास शाळीग्राम, अमृता कुलकर्णी, साहित्यकार तथा बड़ी संख्या में मान्यवर उपस्थित थे।

प्रा. मिलिंद जोशी ने कहा, “प्रार्थना व्यक्ति से समष्टि तक की यात्रा है। मन के विकारों और नकारात्मक विचारों को दूर कर विवेक जागृत करने की शक्ति प्रार्थना में होती है। प्रार्थना मन को शुद्ध करती है।”

लेखक सूर्यकांत द. वैद्य ने अपने मनोगत में कहा, “बाल्यकाल से मिले संस्कारों के कारण कविता के प्रति रुचि विकसित हुई और महाविद्यालयीन जीवन में वह और अधिक प्रफुल्लित हुई। गुरुओं का मार्गदर्शन, साहित्यिक मित्रों का सान्निध्य और अध्यापन के अनुभव ने मेरे व्यक्तित्व को आकार दिया। ग्रामीण क्षेत्र में रहते हुए लेखन कुछ समय के लिए रुक गया था, लेकिन विशेष रूप से सुहास शाळीग्राम और उनके सहपाठियों की प्रेरणा से वह पुनःप्रारंभ हुआ। इसी से ‘सूर्यफुले’ और ‘सूर्यकिरण’ जैसे संग्रह प्रकाशित हुए। शिक्षक और विद्यार्थी एक-दूसरे को गढ़ते हैं। मेरे विद्यार्थियों ने मेरे भीतर की सर्जनशीलता को फिर से जागृत किया।”

विद्यालयीन स्मृतियों को साझा करते हुए सुहास शाळीग्राम ने कहा, “वैद्य सर ने विद्यार्थियों को केवल कविता नहीं सिखाई, बल्कि कविता को देखने की दृष्टि दी। नव्वे वर्ष की आयु में भी उनकी लेखनी उतनी ही सक्रिय और ऊर्जावान है। ‘प्रार्थना’ कविता संग्रह उनके परिपक्व चिंतन और समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता का परिचायक है। संस्कारवान शिक्षक और संवेदनशील कवि के रूप में उनका कार्य प्रेरणादायी है।”
सांसद डॉ. मेधाताई कुलकर्णी ने कहा, “कविता संग्रह ‘प्रार्थना’ की कविताओं में सामाजिक जागरूकता, आध्यात्मिक चिंतन और मानवीय मूल्यों का विशेष समावेश है। वर्तमान समय में मराठी शुद्धलेखन की उपेक्षा दिखाई देती है। मराठी भाषा को अभिजात भाषा का दर्जा मिलने के बाद भाषा की शुद्धता बनाए रखने की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। शुद्ध भाषा, उत्कृष्ट लेखन और संवेदनशील पाठकों के माध्यम से मराठी संस्कृति और समृद्ध होगी। ‘आई’, ‘बाबा’ और मातृभाषा जैसे शब्दों की आत्मीयता बनाए रखने के लिए मराठी पुस्तकों का निर्माण और पठन संस्कृति को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।”

मिहाना पब्लिकेशन्स की अमृता कुलकर्णी ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का संचालन गीत-ग़ज़लकार सुधीर कुबेर ने किया, जबकि महेंद्र वैद्य ने आभार प्रदर्शन किया

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