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पुणे विश्वविद्यालय पर दिए बयान को लेकर चंद्रकांत पाटिल का स्पष्टीकरण

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पुणे : महाराष्ट्र के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री चंद्रकांत पाटिल ने सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय को लेकर दिए गए अपने हालिया बयान पर उठे विवाद के बीच विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया है। उन्होंने कहा कि डेक्कन एजुकेशन सोसायटी के डीईएस पुणे विश्वविद्यालय के ‘स्कूल ऑफ साइंस’, गणित विभाग एवं अनुसंधान केंद्र भवन के उद्घाटन कार्यक्रम में उन्होंने “सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय का समाज के लिए योगदान क्या है?” यह प्रश्न शोध और नवाचार के संदर्भ में उठाया था, लेकिन कुछ लोगों द्वारा उनके वक्तव्य का गलत अर्थ निकालकर भ्रम फैलाने का प्रयास किया जा रहा है।

पाटिल ने स्पष्ट किया कि उनके मन में सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के योगदान को लेकर कोई संदेह नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों से अधिक उत्कृष्ट प्रदर्शन की अपेक्षा रखते हैं, उसी प्रकार उनकी भावना भी विश्वविद्यालय से और अधिक ऊंचाइयों तक पहुंचने की अपेक्षा की थी, न कि उसकी उपलब्धियों को कमतर आंकने की।

उन्होंने कहा कि स्थापना के बाद से विश्वविद्यालय ने राज्य और देश की शैक्षणिक एवं सामाजिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह देश के प्रमुख ज्ञान केंद्रों में से एक है और यहां के अनेक शोधकर्ताओं, प्राध्यापकों तथा विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। भारत की अनेक शिक्षण संस्थाएं शोध और नवाचार के क्षेत्र में पुणे विश्वविद्यालय को आदर्श मानती हैं। मंत्री ने कहा कि उनके वक्तव्य का उद्देश्य विश्वविद्यालय की गौरवशाली परंपरा पर प्रश्नचिह्न लगाना नहीं था, बल्कि इसे भविष्य की अधिक परिपक्व अपेक्षाओं और अनुसंधान को नई दिशा देने वाले सकारात्मक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए।

उन्होंने नीति आयोग की रिपोर्ट ‘इम्प्रूविंग द कल्चर ऑफ रिसर्च एंड डेवलपमेंट इन स्टेट यूनिवर्सिटीज एंड इंस्टीट्यूट्स’ का उल्लेख करते हुए कहा कि रिपोर्ट में भी पारंपरिक विश्वविद्यालयों के सामने उच्च गुणवत्ता वाले शोध की चुनौतियों का जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में उच्च शिक्षा संस्थानों का व्यापक नेटवर्क बनने के बावजूद अधिकांश पारंपरिक विश्वविद्यालयों को उल्लेखनीय स्तर के अनुसंधान में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

चंद्रकांत पाटिल ने कहा कि यदि भारत को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनना है, तो विश्वविद्यालयों को केवल पारंपरिक शिक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। शोध कार्य केवल शोध-पत्र प्रकाशित करने या आर्थिक लाभ तक सीमित न रहकर समाज के सामने मौजूद वास्तविक समस्याओं के समाधान में भी योगदान देने वाला होना चाहिए, ताकि उसका लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंच सके।

उन्होंने बताया कि राज्य के विश्वविद्यालयों में अनुसंधान को अधिक गति और गुणवत्ता प्रदान करने के उद्देश्य से वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रघुनाथ माशेलकर के मार्गदर्शन में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करने की घोषणा की गई है। यह समिति राज्य के विश्वविद्यालयों में शोध संस्कृति को मजबूत करने और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए सुझाव देगी।

पाटिल ने कहा कि उनका उद्देश्य हमेशा उच्च शिक्षा संस्थानों को और अधिक सक्षम, नवोन्मेषी तथा समाजोपयोगी बनाना रहा है और महाराष्ट्र सरकार इस दिशा में निरंतर प्रयासरत है।

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