• आईवीएफ उपचार की सफलता में भ्रूण (एम्ब्रियो) की गुणवत्ता की लगभग ४० से ६०% भूमिका होती है।
• आधुनिक तकनीक की मदद से भ्रूण की सुरक्षा और उपचार की गुणवत्ता को बेहतर बनाया गया है।
पुणे : भारत में लगभग हर ६ में से १ दंपति को संतान होने में परेशानी (बांझपन) का सामना करना पड़
रहा है। यह समस्या महिलाओं और पुरुषों, दोनों में समान रूप से देखी जा रही है। आज बांझपन के लगभग ४० से ५० % मामलों में पुरुषों से जुड़ी समस्याएं भी कारण बन रही हैं। वहीं, डॉक्टरों के अनुसार २० के दशक के आखिर और 30 की शुरुआती उम्र की लगभग ३० % महिलाओं में अंडों (एग्स) की गुणवत्ता
पहले की तुलना में कम हो रही है। इसकी एक बड़ी वजह बदलती जीवनशैली, बढ़ता तनाव और स्वास्थ्य से जुड़ी बदलती आदतें मानी जा रही हैं। इसी बढ़ती जरूरत को देखते हुए नोवा आईवीएफ फर्टिलिटी, लुल्लानगर ने अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार नई और आधुनिक एम्ब्रायोलॉजी लैब की शुरुआत की गई है।
इस लैब में आधुनिक इन्क्यूबेटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से शुक्राणू और भ्रूण (एम्ब्रियो) की जांच करने वाली तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक विटनेसिंग सिस्टम और लैब की हवा को साफ और सुरक्षित रखने के लिए लगातार निगरानी की व्यवस्था की गई है। इन तकनीकों का उद्देश्य भ्रूण का बेहतर विकास, मरीजों की सुरक्षा और आईवीएफ उपचार के बेहतर परिणाम सुनिश्चित करना है।
भ्रूण की पूरी सुरक्षा के लिए लैब में RFID आधारित इलेक्ट्रॉनिक विटनेसिंग सिस्टम, सख्त गुणवत्ता जांच और हर प्रक्रिया की लगातार निगरानी की जाती है। इससे अंडाणु, शुक्राणु और भ्रूण को इलाज के हर
चरण में पूरी सावधानी और सही तरीके से संभाला जाता है। इसके अलावा, मरीजों को समय-समय पर भ्रूण के विकास की जानकारी भी दी जाती है। इलाज के हर महत्वपूर्ण चरण की दोबारा जांच और पुष्टि की जाती है, ताकि दंपतियों का भरोसा बना रहे और इलाज के दौरान उनकी चिंता कम हो
सके।
नोवा आईवीएफ फर्टिलिटी, लुल्लानगर की फर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. रूपाली तांबे ने कहा, “हमारी लैब की सटीकता का प्रमाण मीरा और राजेश (बदला हुआ नाम), जिनकी उम्र ४२ और ४३ वर्ष थी। वे
अपने दूसरे बच्चे के लिए काफी समय से कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी।
उनकी उम्र और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उनके लिए विशेष आईवीएफ उपचार की योजना बनाई गई। जहां तक संभव था, हमने उनके अपने अंडाणु और शुक्राणु का ही इस्तेमाल किया। महिला की उम्र और अंडाशय की स्थिति को देखते हुए दवाएं और इलाज तय कि गई। दंपति की बढ़ती उम्र को ध्यान में रखते हुए हमारी एम्ब्रायोलॉजी टीम ने आधुनिक तकनीक की मदद से सबसे अच्छे शुक्राणु चुने,
जेनेटिक जांच की और सबसे स्वस्थ भ्रूण का चयन किया। इसकी वजह से उन्हें पहले ही आईवीएफ चक्र में गर्भधारण करने में सफलता मिली। महिला की उम्र को देखते हुए गर्भावस्था में किसी भी तरह का
जोखिम कम करने के लिए केवल एक ही भ्रूण गर्भाशय में रखा गया। यह मामला दिखाता है कि मरीज की जरूरत के अनुसार सही इलाज और आधुनिक आईवीएफ लैब की मदद से मुश्किल मामलों में भी अच्छे परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।”
आईवीएफ लैब को फर्टिलिटी उपचार का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, क्योंकि आईवीएफ की सफलता काफी हद तक भ्रूण (एम्ब्रियो) की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। उपचार की सफलता में इसकी लगभग ४० से ६०% भूमिका होती है। इसी लैब में अंडाणु, शुक्राणु और भ्रूण को इलाज के सबसे महत्वपूर्ण समय के दौरान साफ, सुरक्षित और नियंत्रित वातावरण में रखा जाता है, ताकि उनका सही तरीके से विकास हो सके।

