पुणे: आषाढ़ी एकादशी के अवसर पर सूर्यदत्त नेशनल स्कूल परिसर “ज्ञानोबा माउली-तुकाराम”, “जय हरी विठ्ठल” और “विठ्ठल-विठ्ठल” के जयघोष से भक्तिमय हो उठा। महाराष्ट्र की समृद्ध वारकरी परंपरा से विद्यार्थियों को परिचित कराने तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से विद्यालय में पारंपरिक पालखी उत्सव का भव्य आयोजन किया गया। इस दौरान अभंगों की स्वर लहरियों, टाल-मृदंग की गूंज और विठ्ठल-रुक्मिणी के जयघोष से पूरा परिसर भक्तिरस में सराबोर हो गया।
सूर्यदत्त एजुकेशन फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष प्रो. डॉ. संजय बी. चोरडिया एवं उपाध्यक्ष सुषमा चोरडिया के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने वारकरी वेशभूषा धारण कर उत्साहपूर्वक दिंडी में भाग लिया। सिर पर तुलसी वृंदावन, हाथों में भगवा ध्वज, टाल-चिपलियां और विठ्ठल नाम के अखंड जाप ने विद्यालय परिसर में पंढरपुर की वारी का जीवंत दृश्य प्रस्तुत कर दिया। विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत अभंग, भक्तिगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने अभिभावकों एवं शिक्षकों का मन मोह लिया।
इस अवसर पर विद्यार्थियों को वारकरी संप्रदाय की परंपरा, आषाढ़ी वारी का महत्व तथा संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम और अन्य संतों के विचारों से परिचित कराया गया। श्रद्धा, समता, सेवा, विनम्रता और समाजहित का संदेश देने वाली वारकरी परंपरा को अनुभवात्मक शिक्षण के माध्यम से बच्चों तक पहुंचाया गया। कथाकथन, भक्तिगीत, संवादात्मक गतिविधियों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के जरिए विद्यार्थियों ने भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत को करीब से जाना।
विद्यालय के संस्थापक अध्यक्ष प्रो. डॉ. संजय बी. चोरडिया ने कहा कि पंढरपुर की वारी महाराष्ट्र की सबसे बड़ी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं में से एक है, जो भक्ति, समानता और सामाजिक एकता का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष पालखी उत्सव का विशेष आकर्षण ‘जल संरक्षण’ का संदेश रहा। विद्यार्थियों को पानी का महत्व, वर्षा जल संचयन, जल बचत की आदतें तथा दैनिक जीवन में जल के जिम्मेदार उपयोग के बारे में विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से जानकारी दी गई।
उन्होंने कहा कि सूर्यदत्त नेशनल स्कूल में विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को बढ़ावा देने वाले विविध कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाते हैं। ऐसे आयोजनों के माध्यम से विद्यार्थियों में सामाजिक जिम्मेदारी, सांस्कृतिक गौरव और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने का सतत प्रयास किया जा रहा है।

