पुणे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दौर में सूचनाएं प्राप्त करना और उत्तर तैयार करना आसान हो गया है, लेकिन सही-गलत में अंतर करना, आलोचनात्मक चिंतन करना और नैतिक निर्णय लेना आज भी मानवीय क्षमताओं पर निर्भर है। भविष्य के विश्वविद्यालयों को तकनीक के उपयोग के साथ विद्यार्थियों में मानवीय विवेक, नैतिक चेतना और स्वतंत्र चिंतन विकसित करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यह प्रतिपादन हैदराबाद स्थित इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेजेज यूनिवर्सिटी (ईएफएलयू) के कुलपति प्रो. डॉ. एन. नागराजू ने किया।
वे भारतीय अंग्रेजी भाषा शिक्षक संघ (ELTAI) और एमआईटी आर्ट, डिजाइन एंड टेक्नोलॉजी (एमआईटी-एडीटी) विश्वविद्यालय, लोणी कालभोर, पुणे के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 20वें अंतरराष्ट्रीय एवं 56वें वार्षिक सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में बोल रहे थे।
प्रो. नागराजू ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रभाव केवल तकनीक और कंप्यूटर विज्ञान तक सीमित नहीं है। सभी शैक्षणिक विषयों में एआई साक्षरता विकसित करना समय की आवश्यकता है। एआई लेखन, सूचना विश्लेषण और उत्तरों की जांच में सहायता कर सकता है, लेकिन ज्ञान की खोज, वास्तविकता और भ्रम के बीच अंतर तथा उचित-अनुचित का विवेकपूर्ण निर्णय लेने की मानवीय क्षमता का विकल्प नहीं बन सकता।
उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं के विकास, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संवाद के बीच संतुलन बनाए रखना उच्च शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बावजूद शिक्षा का केंद्र मानवीय अनुभव, आलोचनात्मक चिंतन, सत्य की खोज और नैतिक मूल्य ही रहने चाहिए।
अनिश्चितता में धैर्य और विवेक जरूरी
प्रो. नागराजू ने अंग्रेजी कवि जॉन कीट्स की ‘नेगेटिव कैपेबिलिटी’ अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि अनिश्चितता और अस्पष्टता की स्थिति में भी धैर्य बनाए रखते हुए विचार करना आवश्यक है। वैश्विक राजनीतिक, सामाजिक और तकनीकी बदलावों के बीच शिक्षण संस्थानों को जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने के बजाय विभिन्न संभावनाओं पर विचार कर निर्णय लेने की संस्कृति विकसित करनी चाहिए।
सम्मेलन का आयोजन एमआईटी-एडीटी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ह्यूमैनिटीज और स्कूल ऑफ होलिस्टिक डेवलपमेंट के आतिथ्य में किया गया। इसमें देशभर से लगभग 1,000 अंग्रेजी शिक्षक एवं प्रतिनिधि तथा नेपाल, बांग्लादेश, इराक, उज्बेकिस्तान, मलेशिया और थाईलैंड सहित विभिन्न देशों के 50 से अधिक अंतरराष्ट्रीय विद्वानों ने भाग लिया। सम्मेलन में शिक्षकों और शोधकर्ताओं ने अपने शोधपत्र भी प्रस्तुत किए।
इस अवसर पर ब्रिटिश काउंसिल के उपनिदेशक शैनन वेस्ट, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया निदेशक टी. के. अरुणाचलम, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पद्मश्री सम्मानित गिरीश प्रभुणे, एमआईटी-एडीटी विश्वविद्यालय की कार्यकारी निदेशक प्रो. डॉ. सुनीता कराड, कुलपति प्रो. डॉ. राजेश एस., प्रोवोस्ट डॉ. सायली गणकर, सम्मेलन के मुख्य आयोजक एवं स्कूल ऑफ होलिस्टिक डेवलपमेंट के निदेशक प्रो. डॉ. अतुल पाटील तथा ELTAI के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. किशोर सेल्वा बाबू सहित अन्य गणमान्य उपस्थित थे।
पढ़ने से बढ़ती है बहुश्रुतता : पद्मश्री प्रभुणे
विद्यार्थियों के लिए आयोजित ‘रीड फेस्ट’ अर्थात वाचन महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर पद्मश्री गिरीश प्रभुणे ने कहा कि किसी भी भाषा में दक्षता हासिल करने के लिए उस भाषा के साहित्य का नियमित अध्ययन आवश्यक है। पढ़ने की आदत से शब्द भंडार बढ़ता है, ज्ञान का विस्तार होता है और विभिन्न विषयों पर स्पष्ट एवं बेबाक राय रखने का आत्मविश्वास विकसित होता है।
उन्होंने कहा कि भाषा के बिना विज्ञान की अभिव्यक्ति संभव नहीं है और विज्ञान को भी अपने विचारों के संप्रेषण के लिए भाषा की आवश्यकता होती है। विद्यार्थियों ने वाचन महोत्सव में उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कार्यक्रम की शुरुआत विश्वशांति प्रार्थना से हुई और समापन राष्ट्रगीत के साथ हुआ। डॉ. अशोक घुगे, डॉ. स्वप्निल शिरसाट और प्रो. स्नेहा वाघटकर ने संचालन किया।

