मशीनों के सुख से अधिक श्रेष्ठ है मानवीय मूल्यों का विकास : जैनाचार्य युगभूषणसूरिजी महाराजा

सूर्यदत्त ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट्स में विशेष मार्गदर्शन सत्र
वे सूर्यदत्त एजुकेशन फाउंडेशन और ‘ज्योत’ स्वयंसेवी संस्था के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित विशेष संवाद सत्र में बोल रहे थे। इस अवसर पर शहर के कई शिक्षाविद, विद्यार्थी, अभिभावक और विभिन्न क्षेत्रों के मान्यवर बड़ी संख्या में उपस्थित थे। कार्यक्रम में सूर्यदत्त ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट्स के संस्थापक अध्यक्ष प्रो. डॉ. संजय बी. चोरडिया, उपाध्यक्ष सुषमा चोरडिया और सहयोगी उपाध्यक्ष स्नेहल नवलखा सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के आधार पर समकालीन वैश्विक मुद्दों पर चिंतन करने वाली ‘ज्योत’ संस्था के सहयोग से यह कार्यक्रम आयोजित किया गया।
विशेष मार्गदर्शन सत्र में जैनाचार्य युगभूषणसूरिजी महाराज ने भारतीय परंपरा के वैश्विक महत्व पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज के अत्यधिक तनावपूर्ण और प्रतिस्पर्धी युग में केवल भारतीय मूल्याधारित जीवन पद्धति ही पूरे विश्व को शांति का सही मार्ग दिखा सकती है। उन्होंने कहा कि प्रगति की ऊंचाइयों तक पहुंचते समय मानव को अपने भीतर के अहंकार का त्याग कर परोपकार और संवेदनशीलता की भावना विकसित करनी चाहिए।
उन्होंने कहा, “मशीनों की प्रगति शरीर को भौतिक सुख दे सकती है, लेकिन मन की शांति और विश्वकल्याण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें पुनः मानवीय मूल्यों की ओर लौटना होगा।” उन्होंने यह भी कहा कि समाज के प्रति संवेदनशीलता ही व्यक्ति को वास्तव में संस्कारित बनाती है।
इस अवसर पर उन्होंने ‘भारतीय ज्ञान परंपरा — वैश्विक अस्थिरता का समाधान’ और ‘सबरीमाला पुनर्विचार — भारत में धर्म का भविष्य’ इन दो विषयों पर विचारपूर्ण और गहन व्याख्यान दिया। इन विषयों के माध्यम से उन्होंने वैश्विक संघर्षों से लेकर संवैधानिक मुद्दों तक भारतीय ज्ञान परंपरा और न्याय व्यवस्था की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की।
जैनाचार्य युगभूषणसूरिजी महाराज ने कहा कि आज विश्व में अशांति, अन्याय, अत्याचार, प्रदूषण, बेरोजगारी और स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याएं बढ़ रही हैं। तथाकथित विकसित देशों की नीतियों ने भी इस स्थिति को जन्म दिया है। संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंच पर पिछले 75 से अधिक वर्षों से कुछ देशों के पास नकाराधिकार (वीटो) की शक्ति है, जो वैश्विक व्यवस्था में असंतुलन को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि इस स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए अन्य देशों को एकजुट होकर वैश्विक स्तर पर सकारात्मक दबाव बनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि विश्वकल्याण का विचार प्रस्तुत करने वाली भारत की ज्ञान परंपरा को भौतिकता की दौड़ में भुला दिया गया है। हमारे ऋषियों, मनीषियों और ज्ञान तपस्वियों ने जो जीवन मूल्य और ज्ञान परंपरा स्थापित की है, उसका पुनर्जागरण समय की आवश्यकता है।
प्रो. डॉ. संजय बी. चोरडिया ने कहा कि वर्तमान समय में विश्वभर में तनाव की स्थिति बढ़ती जा रही है। भारत में भी सबरीमाला मामले की पुनर्विचार याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई की तैयारी कर रहा है। ऐसे समय में जैनाचार्य युगभूषणसूरिजी महाराज का मार्गदर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय विचारधारा विश्व को अहिंसा और शांति का मार्ग दिखा सकती है।
कार्यक्रम के उत्तरार्ध में प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें शिक्षकों, छात्रों और उपस्थित अतिथियों ने समकालीन विषयों पर प्रश्न पूछे। जैनाचार्य युगभूषणसूरिजी महाराज ने इन प्रश्नों के विस्तार से उत्तर दिए, जिससे सत्र अत्यंत रोचक और ज्ञानवर्धक बन गया।
कार्यक्रम के अंत में सुषमा चोरडिया ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि महाराज के दिव्य विचारों से पूरा परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मकता से भर गया है।
इस कार्यक्रम में गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ़ पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स तथा अजिंक्य डी. वाय. पाटिल विश्वविद्यालय सहित विभिन्न संस्थानों के विद्यार्थी, शोधकर्ता, विधि विशेषज्ञ और विचारक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कुल मिलाकर 600 से अधिक विद्यार्थियों और नागरिकों ने इस प्रेरणादायी कार्यक्रम में भाग लिया।



