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नक्सलवाद खत्म होने का श्रेय सिर्फ केंद्र सरकार को नहीं; यूपीए सरकारों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण – गोपालदादा तिवारी

नक्सलवाद के खात्मे पर श्रेय की राजनीति, गृहमंत्री के बयान पर कांग्रेस का तीखा हमला

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पुणे : देश में नक्सलवाद/माओवादी लड़ाई पिछली सरकारों के समय से चल रही है, और कांग्रेस के नेताओं ने समय-समय पर नक्सल हमलों का सामना करते हुए अपनी जान गंवाई है और शहीद हुए हैं। कांग्रेस की सरकारों ने नक्सलियों को रोकने के लिए कई कानून बनाए। लेकिन आज कांग्रेस के गृह मंत्री अमित शाह जो माओवादी नक्सलियों के खात्मे का एकतरफा क्रेडिट ले रहे हैं, ये गलत है. बल्कि नक्सलवाद खत्म होने का श्रेय सिर्फ केंद्र सरकार को नहीं, यूपीए सरकारों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है, जिन्होंने संघर्ष के ज़रिए धीरे-धीरे नक्सलवाद को खत्म किया था. यह कड़ी आलोचना महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के सीनियर प्रवक्ता गोपालदादा तिवारी ने की है, और गृह मंत्री अमित शाह के बेबुनियाद बयानों को बचकाना, घमंडी और बेतुका बताया है।

तिवारी ने कहा कि नक्सलवाद या माओवादी समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि यह दशकों से देश के कई राज्यों में फैली हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार इस जटिल समस्या के समाधान का पूरा श्रेय खुद लेने की कोशिश कर रही है, जबकि इसमें पूर्ववर्ती कांग्रेस-नीत सरकारों का भी बड़ा योगदान रहा है।
उन्होंने गृह मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2004 से 2013 के बीच 2160 नक्सली मारे गए, जबकि 2014 से 2025 के बीच यह संख्या 2088 रही। उनके अनुसार, ये आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि पूर्व सरकारों ने भी नक्सलवाद के खिलाफ मजबूत और प्रभावी अभियान चलाए थे।

कांग्रेस प्रवक्ता ने नक्सल हिंसा में जान गंवाने वाले नेताओं का जिक्र करते हुए कहा कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने इस संघर्ष में अपने प्राण न्योछावर किए। इनमें महेंद्र कर्मा, विद्याचरण शुक्ल और नंदकुमार पटेल जैसे नाम शामिल हैं। तिवारी के अनुसार, नक्सलवाद में कमी आने के पीछे केवल सुरक्षा अभियान ही नहीं, बल्कि सामाजिक और विकासात्मक पहल भी अहम रही हैं। उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार के दौरान आदिवासी क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और संचार सुविधाओं का विस्तार किया गया, साथ ही नक्सलियों को मिलने वाले संसाधनों की आपूर्ति भी रोकी गई।

आदिवासी अधिकारों के मुद्दे पर उन्होंने वन अधिकार कानून 2006 और भूमि अधिग्रहण कानून 2013 जैसे कदमों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कानूनों ने आदिवासियों को कानूनी सुरक्षा और सशक्तिकरण प्रदान किया। वहीं, उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार इन अधिकारों को कमजोर कर कॉर्पोरेट हितों को बढ़ावा दे रही है।

कांग्रेस ने यह भी कहा कि “नक्सलवाद पूरी तरह खत्म हो गया है” कहना वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाता, क्योंकि सरकार खुद स्वीकार करती है कि देश के कई जिले अब भी नक्सल प्रभावित हैं।इसके साथ ही उन्होंने कहा, असली सवाल विकास के मॉडल का है—विकास किसके लिए हो रहा है और किस कीमत पर। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आदिवासियों की सहमति के बिना उनके संसाधनों का उपयोग किया गया, तो इससे असंतोष बढ़ सकता है और भविष्य में फिर से उग्रवाद को बढ़ावा मिल सकता है।

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