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छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा किए गए धर्मांतरितों के ‘शुद्धीकरण’ को 350 वर्ष पूरे!

19 जून को ‘राष्ट्रीय घरवापसी दिवस' के रूप में मनाएं! - हिंदू जनजागृति समिति का सभी हिंदू संगठनों से आह्वान

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हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज न केवल एक महान योद्धा थे, बल्कि वे एक महान धर्मरक्षक और दूरदर्शी युगपुरुष भी थे। आज से ठीक 350 वर्ष पहले, यानी 19 जून 1676 के दिन, छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने पराक्रमी सेनापति नेताजी पालकर का ‘शुद्धीकरण’ कर उन्हें पुनः हिंदू धर्म में ससम्मान प्रवेश दिलाया था। इस अभूतपूर्व और ऐतिहासिक घटना को 19 जून 2026 को पूरे 350 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस ऐतिहासिक त्रिशताब्दी सुवर्ण महोत्सव (350वीं वर्षगांठ) के अवसर पर इस दिन को देश भर में ‘राष्ट्रीय घरवापसी दिवस’ के रूप में मनाया जाए, ऐसा आह्वान हिंदू जनजागृति समिति ने सभी हिंदू संगठनों से किया है।

     स्वराज्य के पहले सेनापति नेताजी पालकर को मुगलों ने कपट से बंदी बना लिया था। अत्यंत प्रताड़ना देकर उन्हें जबरन मुसलमान बनाया गया और उनका नाम ‘मुहम्मद कुली खान’ रखा गया। कई वर्षों तक परधर्म और परदेस में रहने के बाद भी नेताजी का मन स्वराज्य के लिए तड़प रहा था। जब वे मुगलों के चंगुल से छूटकर पुनः रायगढ़ में छत्रपति शिवराया के चरणों में आए, तब महाराज ने धर्मशास्त्र के अनुसार विधि-विधान से उनका ‘शुद्धीकरण’ किया। ‘जेधे शकावली’ के अनुसार शके 1598, आषाढ़ वद्य 4 (19 जून 1676) के दिन नेताजी पालकर को पुनः हिंदू धर्म में स्वीकार किया गया था।

     इस विषय पर बात करते हुए समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री. रमेश शिंदे ने कहा कि: “आज 350 वर्षों के बाद भी यह इतिहास हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक है। विभिन्न प्रलोभनों, दबाव या प्रताड़ना के शिकार होकर हमारे लाखों हिंदू भाई-बहन धर्मांतरित हुए हैं। आज के समय में ‘लव जिहाद’ जैसे सुनियोजित संकट का शिकार होकर हमारी कई हिंदू युवतियां दूसरे धर्मों में धकेली जा रही हैं। ‘वह चली गई तो जाने दो, अब हमारा उससे कोई संबंध नहीं है’, इस मानसिकता का हिंदू समाज को अब त्याग करना चाहिए। प्यार के झूठे जाल में फंसाकर छली गई हमारी बेटियों और बहनों को पुनः ससम्मान हिंदू धर्म और समाज में सुरक्षित स्थान देने के लिए इस ऐतिहासिक दिन का स्मरण करना अत्यंत आवश्यक है। छत्रपति शिवाजी महाराज का यही आदर्श सामने रखकर समस्त हिंदू समाज, संतों और संगठनों को आगे आने की आवश्यकता है। जो भाई और विशेषकर जो बहनें मुख्य धारा (हिंदू धर्म) में वापस आना चाहती हैं, उनके लिए हमें अपने दरवाजे और मन खुले रखने चाहिए।”

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