एमआईटी-एडीटी विश्वविद्यालय में ‘नागरिक सेवा और राष्ट्रनिर्माण’ राष्ट्रीय परिषद संपन्न
यूपीएससी में नैतिकता विषय शामिल होने पर हुई थी आलोचना : पूर्व अध्यक्ष डॉ. डी. पी. अग्रवाल

पुणे : देश की सबसे बड़ी और अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्रीय लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षाओं के पाठ्यक्रम में अपने कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। जब सिविल सेवा परीक्षा में नैतिकता (एथिक्स) विषय को शामिल करने का निर्णय लिया गया, तब इसकी व्यापक आलोचना हुई। हालांकि, तत्कालीन सरकार और मंत्रालय ने आयोग पर पूर्ण विश्वास जताया, जिसके परिणामस्वरूप इन परिवर्तनों को प्रभावी रूप से लागू किया गया। समय के साथ नैतिकता के महत्व को सभी ने स्वीकार किया, ऐसा मत यूपीएससी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. डी. पी. अग्रवाल ने व्यक्त किया।

वे एमआईटी आर्ट, डिज़ाइन एंड टेक्नोलॉजी विश्वविद्यालय, विश्वराजबाग, पुणे स्थित स्कूल ऑफ इंडियन सिविल सर्विसेज (एसआईसीएस) द्वारा सिविल सेवा की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए आयोजित “सिविल सेवा और राष्ट्रनिर्माण” विषयक राष्ट्रीय परिषद में बोल रहे थे।
इस अवसर पर महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. किशोर राजे निम्बालकर, विश्वविद्यालय के कार्यकारी अध्यक्ष एवं कुलपति प्रो. डॉ. मंगेश कराड, प्रोवोस्ट डॉ. सायली गणकर, प्रो-कुलपति डॉ. मोहित दुबे, स्कूल ऑफ इंडियन सिविल सर्विसेज के निदेशक डॉ. सुजीत धर्मपात्रे, स्कूल ऑफ लॉ के अधिष्ठाता डॉ. गोविंद राजपाल सहित अनेक गणमान्य उपस्थित थे।
अपने संबोधन में डॉ. अग्रवाल ने कहा कि सिविल सेवा परीक्षाओं में नैतिकता विषय को शामिल करने से पूर्व इसे सूचना प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन संस्थान (आईआईटीएम), ग्वालियर में लागू किया गया था। नैतिकता बिना किसी को कष्ट पहुँचाए कार्यों को प्रभावी ढंग से संपन्न करने में सहायक होती है। नैतिक मूल्यों के पालन से विश्व में शांति की स्थापना होती है। अतः देश की रीढ़ माने जाने वाले भावी प्रशासकों में नैतिक मूल्यों का होना अनिवार्य है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक व्यक्ति सिविल सेवक नहीं बन सकता, किंतु यूपीएससी और एमपीएससी के अतिरिक्त भी समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाकर राष्ट्रनिर्माण में योगदान दिया जा सकता है।
इस अवसर पर प्रो. डॉ. मंगेश कराड ने कहा कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या अधिकारियों की नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक को अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजग होना आवश्यक है। यदि हर नागरिक अपने-अपने क्षेत्र में ईमानदारी और नियमों का पालन करते हुए कार्य करे, तो वर्ष 2047 तक भारत एक विकसित राष्ट्र बनकर वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरेगा।
कार्यक्रम के उद्घाटन के पश्चात अपराह्न सत्र में डॉ. पल्लवी दराडे (आईआरएस), प्रदीप कुमार यादव (आईपीएस) तथा पुणे की आयकर आयुक्त वैशाली पतेंगे (आईआरएस) ने सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया। कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रोवोस्ट डॉ. सायली गणकर ने की, जबकि आभार प्रदर्शन डॉ. सुजीत धर्मपात्रे ने किया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. स्नेहा वाघटकर ने किया।
प्रतियोगी परीक्षाओं के मार्गदर्शन हेतु ‘लक्ष्य’ क्लब की स्थापना
इस अवसर पर सिविल सेवा तथा राज्य सेवा परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए ‘लक्ष्य’ नामक क्लब की स्थापना की गई। इस क्लब के माध्यम से विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग, प्रबंधन एवं अन्य संकायों के विद्यार्थियों को, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना चाहते हैं, एमआईटी-एसआईसीएस के प्राध्यापकों एवं विशेषज्ञों द्वारा निरंतर मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाएगा।



