
पुणे : प्रत्येक सरकारी योजना के पीछे उद्देश्य सकारात्मक और जनकल्याणकारी होता है, लेकिन प्रभावी क्रियान्वयन के अभाव में कई योजनाएं आम नागरिकों तक अपेक्षित रूप से नहीं पहुंच पातीं। ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना प्रेरणादायी अवश्य है, किंतु इसकी सफल अमलविधि के लिए सभी भारतीयों की सामूहिक जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह विचार पूर्व सांसद तथा पुणे की पूर्व महापौर वंदना चव्हाण ने व्यक्त किए।
वे एमआईटी आर्ट, डिज़ाइन एंड टेक्नोलॉजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंडियन सिविल सर्विसेज (एमआईटी-एसआईसीएस) द्वारा ‘विकसित भारत @2047 : सशक्त नागरिक, सक्षम नीतियां और मजबूत संस्थाएं’ विषय पर भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में बोल रही थीं।
चव्हाण ने कहा कि ‘विकसित भारत’ के निर्माण में पर्यावरणीय स्थिरता विकास की मूलभूत शर्त है। आर्थिक प्रगति पर्यावरण संरक्षण, सतत शहरी नियोजन तथा जिम्मेदार सार्वजनिक आधारभूत संरचनाओं के साथ ही सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी जोर दिया कि सार्वजनिक सुविधाओं के निर्माण के बाद उन्हें शीघ्र नागरिकों के उपयोग के लिए शुरू किया जाना आवश्यक है।
सम्मेलन में सार्वजनिक नीति, सुशासन, भारतीय ज्ञान परंपरा तथा विदेश नीति जैसे विषयों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। देशभर से आए विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, प्राध्यापकों और नीति विशेषज्ञों ने वर्ष 2047 तक विकसित, आत्मनिर्भर और संस्थागत रूप से सशक्त भारत निर्माण के विभिन्न आयामों पर चर्चा की।
इस अवसर पर एमआईटी-एडीटी विश्वविद्यालय के कार्याध्यक्ष प्रो. डॉ. मंगेश कराड, कुलगुरु डॉ. राजेश एस., डेक्कन इंस्टीट्यूट के कुलगुरु डॉ. प्रसाद जोशी, सिम्बायोसिस इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के उपनिदेशक प्रो. डॉ. अल्विटे निंगथौजाम, प्रोवोस्ट डॉ. सायली गणकर, एमआईटी-एसआईसीएस के निदेशक डॉ. सुजीत धर्मपात्रे तथा सम्मेलन समन्वयक डॉ. विकास कोळेकर उपस्थित थे।
मुख्य वक्ता डॉ. जोशी ने कहा कि ‘विकसित भारत’ की अवधारणा भारतीय संस्कृति, मूल्यों और मजबूत संस्थागत संरचना पर आधारित होनी चाहिए। वहीं प्रोवोस्ट डॉ. गणकर ने राष्ट्र निर्माण में विश्वविद्यालयों की भूमिका स्पष्ट करते हुए शोध, नीतिगत नवाचार और मूल्य आधारित शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि एमआईटी भारतीय सिविल सेवा प्रशिक्षण विभाग अपने बीए (एडमिनिस्ट्रेशन) और एमए (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) पाठ्यक्रमों के माध्यम से भावी प्रशासनिक अधिकारियों को तैयार कर रहा है।
डॉ. धर्मपात्रे ने कहा कि विकसित भारत के राष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्रशासनिक स्तर पर प्रभावी रूप से लागू करने में सिविल सेवकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। पारदर्शी प्रशासन, नागरिक केंद्रित सेवाएं और जवाबदेह संस्थाएं विकसित भारत के प्रमुख स्तंभ हैं।
समापन सत्र में प्रो. डॉ. निंगथौजाम ने पश्चिम एशिया के बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य और भारत की सक्रिय विदेश नीति की आवश्यकता पर मार्गदर्शन दिया।
विश्वशांति प्रार्थना से प्रारंभ हुए इस सम्मेलन का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। सम्मेलन की सफलता के लिए एमआईटी-एसआईसीएस के विद्यार्थियों ने विशेष योगदान दिया।


