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5,200 गांव, 2 लाख वनवासी और 46 वर्षों की परिवर्तन यात्रा; सुयश की 46 वर्षों की गौरवशाली यात्रा
मदद से आगे आत्मनिर्भरता का मंत्र; 5,200 गांवों में सुयश ने खड़ी की रोजगार की नई राह
विशेष प्रतिनिधि : देश के दुर्गम और जनजातीय क्षेत्रों के परिवारों को केवल मदद पर निर्भर न रखते हुए उनके हाथों को रोजगार, उत्पादों को बाजार और गांवों को आत्मनिर्भरता की दिशा देने के उद्देश्य से वर्ष 1980 में शुरू हुए सुयश चैरिटेबल ट्रस्ट के कार्य को अब 46 वर्ष पूरे हो चुके हैं। कुछ गांवों से शुरू हुई यह यात्रा आज सात राज्यों, 28 जिलों और 5,200 से अधिक गांवों तक पहुंच चुकी है। इस कार्य का लगभग दो लाख वनवासी नागरिकों ने प्रत्यक्ष अनुभव लिया है। संस्था का मानना है कि देश के अनेक जनजातीय परिवारों की आय कम रहने के पीछे उनकी क्षमता या मेहनत की कमी नहीं, बल्कि शिक्षा, अवसर, बुनियादी सुविधाओं, आधुनिक जानकारी और बाजार तक सीमित पहुंच प्रमुख कारण हैं। इसी पृष्ठभूमि में गांवों की स्थानीय जरूरतों, उपलब्ध संसाधनों और स्थानीय कौशल को रोजगार से जोड़ने का प्रयास सुयश के माध्यम से किया गया है।
संस्था के संस्थापक अध्यक्ष यशवंत घैसास, कार्याध्यक्ष स्मिता घैसास तथा कार्यकारी अध्यक्ष शलाका घैसास हैं।
सुयश चैरिटेबल ट्रस्ट ने गांवों के सर्वांगीण विकास के लिए दस सूत्रीय कार्यपद्धति विकसित की है। किसानों को केवल एक मौसम की खेती पर निर्भर न रहना पड़े और उन्हें वर्षभर आय प्राप्त हो, इसके लिए कृषि पद्धतियों में बदलाव पर जोर दिया गया है। इसके बाद कुटीर उद्योग, कृषि आधारित प्रसंस्करण और छोटे स्थानीय उद्योगों को जोड़कर परिवारों के लिए अतिरिक्त आय के स्रोत विकसित किए गए। संस्था के अनुसार, इस मॉडल के माध्यम से तीन से पांच वर्षों की अवधि में कई परिवारों ने खेती से लगभग डेढ़ से दो लाख रुपये तक वार्षिक आय प्राप्त की है। इसके अलावा प्रसंस्करण उद्योग, कुटीर उद्योग और अन्य पूरक गतिविधियों से लगभग 50 हजार से डेढ़ लाख रुपये तक अतिरिक्त वार्षिक आय प्राप्त हो रही है। यह परिवर्तन किसी एक अनुदान या अल्पकालीन योजना का परिणाम नहीं, बल्कि ज्ञान, प्रशिक्षण, स्थानीय नेतृत्व, निरंतर सहयोग और बाजार से जुड़ाव के माध्यम से संभव हुआ है।
इस कार्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ाकर पलायन कम करने का प्रयास है। स्थानीय स्तर पर ही आय के साधन उपलब्ध हों तो परिवारों को रोजगार के लिए गांव छोड़ने की जरूरत कम हो सकती है। इसी विचार से विभिन्न उपक्रम विकसित किए गए हैं।

आज संस्था से जुड़े लगभग 5,000 परिवार कुटीर उद्योग या विभिन्न प्रसंस्करण गतिविधियों के माध्यम से रोजगार प्राप्त कर रहे हैं। मसाले, साबुन, हल्दी, चावल और दाल मिल, आमचूर, काजू, झाड़ू, पत्तल, घी, सफेद मक्खन, आम आधारित उत्पाद, दुग्ध उत्पाद और अन्य स्थानीय वस्तुओं के निर्माण के माध्यम से स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने का प्रयास किया गया है।
महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण पर भी विशेष जोर दिया गया है। इन विभिन्न उत्पादों से जुड़ी अनेक महिलाओं को सालाना 25 हजार रुपये से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक की आय प्राप्त हो रही है।सुयश के कार्य में प्राकृतिक और जैविक खेती के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। देशी गायों के संरक्षण, जैविक कीटनाशकों, जैविक खाद, कंपोस्ट और वर्मी कंपोस्ट के निर्माण को प्रोत्साहित किया गया है। संस्था के अनुसार, अब तक 10 हजार से अधिक कंपोस्ट पिट तैयार किए गए हैं तथा 10 हजार से अधिक वनराई बंधारे बनाए गए हैं। इसके अलावा 18 लाख से अधिक पौधों का रोपण किया गया है।
इस प्रकार यह पहल केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि मिट्टी, पानी, पर्यावरण, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी जुड़ गई है।
स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने के प्रयासों से कुछ उपक्रमों ने बड़े आर्थिक स्वरूप का रूप लिया है। महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में वर्ष 1980 में कुछ गांवों के स्थानीय परिवारों को आम से सूखे उत्पाद तैयार कर उन्हें बाजार में बेचने का प्रशिक्षण दिया गया था। छोटे स्तर से शुरू हुआ यह उपक्रम आज 39 गांवों के 10 हजार से अधिक परिवारों को जोड़ चुका है। आम के लगभग तीन महीने के मौसम में इस उपक्रम से हर वर्ष 10 करोड़ रुपये से अधिक की बिक्री होती है।
ओडिशा के गंजाम और गजपति जिलों में स्थानीय घास से झाड़ू बनाने का उपक्रम भी इसी तरह विकसित किया गया। कुछ सौ झाड़ुओं से शुरू हुए इस कार्य से आज लगभग 40 गांवों की महिलाएं जुड़ी हुई हैं। वर्ष में दो से ढाई महीने इस काम में शामिल होने वाली महिलाएं मिलकर ढाई लाख से अधिक झाड़ू तैयार करती हैं। इस उपक्रम से लगभग 1 करोड़ 75 लाख रुपये का कारोबार उत्पन्न हो रहा है।
स्थानीय संसाधनों का उपयोग, स्थानीय कौशल का विकास और बाजार से जुड़ाव—इन तीन प्रमुख घटकों पर आधारित यह प्रयास ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन का उदाहरण बनकर सामने आया है।
संस्था की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, वर्ष 2013 में मध्य प्रदेश सरकार के सांस्कृतिक विभाग द्वारा ‘राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख पुरस्कार’, वर्ष 2016 और 2017 में महाराष्ट्र शासन के आदिवासी विकास विभाग द्वारा ‘आदिवासी सेवा संस्था पुरस्कार’ तथा वर्ष 2020 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जनकल्याण समिति की ओर से ‘गुरुजी पुरस्कार’ प्रदान किया गया है।
नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में 600 जनजातीय किसानों ने सहभागिता की थी। इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत तथा जी समूह के संस्थापक सुभाषचंद्र भी उपस्थित थे।
‘सबका साथ, सबका विकास’ की संकल्पना और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय के विचार का संदर्भ देते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति तक अवसर, विकास और सम्मान पहुंचाने के उद्देश्य से सुयश ने कार्य किया है। संस्था के अनुसार, 5,000 से अधिक गांवों में परिवर्तन की मजबूत नींव रखी गई है।
चार दशक से अधिक समय की यह यात्रा केवल किसी संस्था के विस्तार की कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता के एक अलग प्रयोग की कहानी के रूप में सामने आती है। खेती के साथ पूरक व्यवसाय, स्थानीय कच्चे माल पर आधारित उद्योग, महिलाओं के लिए रोजगार, कृषि प्रसंस्करण, जैविक खेती, जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण जैसे विभिन्न घटकों को एक साथ लाकर गांवों की अर्थव्यवस्था को स्थानीय स्तर पर मजबूत करने का प्रयास इस कार्य के माध्यम से किया गया है।
संस्था के अनुसार, यही उसकी ‘मौन क्रांति’ है। इस क्रांति का केंद्र केवल मदद बांटना नहीं, बल्कि स्थानीय व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा करना है।
रोजगार के लिए गांव छोड़ने की नौबत न आए, स्थानीय उत्पादों को उचित बाजार मिले और परिवार की आय में लगातार वृद्धि हो—इसी उद्देश्य से शुरू हुई यह यात्रा आज 5,200 से अधिक गांवों तक पहुंच चुकी है।
ग्रामीण भारत के विकास में स्थानीय कौशल, स्थानीय संसाधनों और बाजार के बीच समन्वय स्थापित किया जाए तो आत्मनिर्भरता की नई अर्थव्यवस्था खड़ी की जा सकती है—चार दशक से अधिक की सुयश की यह यात्रा इसी संदेश को सामने रखती है।



