८२% भारतीयों का स्मार्टफोन कभी न कभी डैमेज हुआ है, लेकिन केवल १५ में से १ व्यक्ति ही इसे सुरक्षित रखता है: वनअसिस्ट रिसर्च स्टडी
पुणे : भारत के सर्वोच्च रेटिंग वाले इंश्योरटेक प्लेटफॉर्म, वनअसिस्ट ने अपनी नवीनतम कंज्यूमर इनसाइट्स रिपोर्ट ‘द ग्रेट इंडियन स्मार्टफोन प्रोटेक्शन क्राइसिस’ के निष्कर्ष जारी किए है । यह रिपोर्ट ग्लोबल मार्केट रिसर्च एजेंसी हंसा रिसर्च के सहयोग से तैयार की गई है। यह रिपोर्ट पूरे भारत में स्मार्टफोन के इस्तेमाल, दुर्घटनावश होने वाले नुकसान और प्रोटेक्शन प्लान अपनाने की स्थिति की समीक्षा करती है।
रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि भारतीय उपभोक्ताओं की स्मार्टफोन पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके बावजूद प्रोटेक्शन प्लान्स को अपनाने की दर काफी कम है। यह स्थिति तब है जब फोन के अचानक खराब या डैमेज होने की घटनाएं बार-बार होती हैं, उपकरणों की कीमतें बढ़ रही हैं और लोग अपने फोन को लंबे समय तक इस्तेमाल कर रहे हैं। जैसे-जैसे स्मार्टफोन भारतीयों के काम करने, बैंकिंग करने, खरीदारी करने, बातचीत करने और मनोरंजन के तरीकों का केंद्र बनता जा रहा है, यह उपभोक्ताओं की सबसे मूल्यवान दैनिक संपत्तियों में से एक बन गया है। स्मार्टफोन की बढ़ती कीमतों और उपभोक्ताओं द्वारा लंबे समय तक इनका उपयोग करने के कारण, किसी भी दुर्घटना से होने वाले नुकसान और रिपेयर का वित्तीय प्रभाव बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।फिर भी, दुर्घटनावश होने वाला नुकसान आम बात बनी हुई है। अध्ययन में पाया गया कि ८२% उपभोक्ताओं का स्मार्टफोन कम से कम एक बार अनजाने में हाथ से गिरा है, जबकि ७२% लोगों ने दुर्घटना में फोन के क्षतिग्रस्त होने का अनुभव किया है। बार-बार और लंबे समय तक स्मार्टफोन के उपयोग से जुड़े रोजमर्रा के जोखिमों को दर्शाते हुए, अचानक फोन गिरना और स्क्रीन टूटना नुकसान के सबसे आम कारणों में सामने आया। नुकसान का भावनात्मक पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है: ३५% भारतीय अपने फोन के गिरते ही घबरा गए, २४% लोग इस घटना के बाद किसी न किसी से बहस अथवा विवाद की स्थिति बनी, और १५% लोगों ने उपकरण के क्षतिग्रस्त होने के सीधे परिणामस्वरूप अपने प्लान रद्द कर दिए। महिलाओं में घबराहट की प्रतिक्रिया अधिक देखी गई, जहाँ ४३% महिलाओं ने फोन गिरने के बाद घबराहट की बात स्वीकार की, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा ३३% था।
अध्ययन में विशेष रूप से ध्यान दिलाया गया है कि जेब या बैग से फोन का फिसलना, दुर्घटना में नुकसान होने वाली कुल घटनाओं का ३६% हिस्सा है। यह दर्शाता है कि कैसे एक सामान्य, रोजमर्रा का पल आर्थिक रूप से सबसे भारी पड़ सकता है। जोखिम के इस व्यापक दायरे के बावजूद, केवल ३६% उपभोक्ताओं ने ही स्मार्टफोन स्वामित्व की अपनी अवधि के दौरान कभी न कभी स्मार्टफोन प्रोटेक्शन प्लान का उपयोग करने की बात कही है, जबकि वर्तमान में सक्रिय प्रोटेक्शन प्लान का आंकड़ा महज ६-८% ही है। लाइफटाइम अवेयरनेस और वर्तमान एक्टिव कवरेज के बीच यह अंतर चौंकाने वाला है। यह एक ऐसे बाजार की ओर इशारा करता है जहाँ उपभोक्ता एक बार प्रोटेक्शन प्लान आजमाते हैं और फिर उसे रिन्यू नहीं कराते, या कोई क्लेम करने से पहले ही उसे छोड़ देते हैं।
भले ही लोग स्मार्टफोन प्रोटेक्शन प्लान के बारे में जानते हैं, लेकिन फिर भी वे इसे लेने से हिचकिचाते हैं। इसके मुख्य कारणों में प्लान का महंगा होना, प्लान के फायदों की पूरी जानकारी ना होना और क्लेम प्रक्रिया में विश्वास की कमी हैं। रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि भारतीय अपने स्तर पर नुकसान से निपटने के लिए किस हद तक अस्थायी उपायों (जुगाड़) का सहारा लेते हैं: २९% लोगों ने पानी से खराब हुए फोन को ठीक करने के लिए चावल का इस्तेमाल किया और २०–३२% लोगों ने टूटे हुए फोन को जोड़ने के लिए टेप या अन्य अस्थायी तरीकों का सहारा लिया। यह जुगाड़ औपचारिक रूप से रिपेयर कराने में झिझक और क्षतिग्रस्त फोन के साथ ही जीने की आदत को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। ये निष्कर्ष इंडस्ट्री के लिए सुरक्षा योजनाओं को सरल बनाने, पारदर्शिता सुधारने और उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ाने के एक बड़े अवसर की ओर इशारा करते हैं।
रिपोर्ट में अलग-अलग उपभोक्ता वर्गों के बीच कुछ प्रमुख अंतर सामने रखे गए हैं। महिलाएं सबसे अधिक निर्भर और संवेदनशील स्मार्टफोन उपभोक्ता हैं: ७९% महिलाएं सोशल मीडिया के लिए स्मार्टफोन का उपयोग करती हैं (पुरुषों के ६९% की तुलना में)। ९४% महिलाओं का फोन गलती से गिरा है (पुरुषों के ८०% की तुलना में)। ७९% महिलाओं के फोन को नुकसान हुआ है (पुरुषों के 71% की तुलना में)। भावनात्मक प्रभाव भी काफी अधिक है। फोन गिरने पर ४३% महिलाएं घबरा गईं (पुरुषों में यह ३३ % था)। महिलाओं में फोन खराब होने की घटनाएं घरेलू माहौल से अधिक जुड़ी हैं। बच्चों या पालतू जानवरों के कारण होने वाले हादसों की दर पुरुषों की तुलना में तीन गुना अधिक पाई गई।
२६–३० वर्ष के युवा उपभोक्ता भारत का सबसे अधिक कनेक्टेड समूह बनकर उभरे हैं। ये बातचीत, डिजिटल भुगतान, शॉपिंग और मनोरंजन के लिए स्मार्टफोन पर सबसे ज्यादा निर्भर हैं।
नये स्मार्टफोन की खरीदारी से इतर, यह रिसर्च भारत के विकसित होते रिफर्निश्ड और प्री-ओन्ड स्मार्टफोन इकोसिस्टम के बढ़ते महत्व की ओर भी इशारा करती है। जैसे-जैसे उपभोक्ता पुराने उपकरणों को अपने पास रखने, बदलने या खरीदने में रुचि दिखा रहे हैं और फोन इस्तेमाल करने की अवधि लंबी हो रही है, स्मार्टफोन के पूरे लाइफसाइकिल में विश्वास पैदा करने के लिए वारंटी और प्रोटेक्शन सॉल्यूशंस बेहद महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं।
आंकड़े स्पष्ट हैं: ७०% उपभोक्ताओं का मानना है कि नए फोन की तुलना में प्री-ओन्ड (पुराने) उपकरणों के लिए प्रोटेक्शन प्लान अधिक महत्वपूर्ण हैं। ३०% लोगों का कहना है कि यदि वारंटी या प्रोटेक्शन प्लान की सुविधा उपलब्ध हो, तो वे रिफर्निश्ड/प्री-ओन्ड फोन खरीदने पर विचार करेंगे, जो रिफर्निश्ड बाजार के लिए एक बड़ा अवसर प्रस्तुत करता है। गैर-मेट्रो शहरों में ५४% उपभोक्ताओं ने प्री-ओन्ड स्मार्टफोन खरीदे हैं जबकि मेट्रो शहरों में यह आंकड़ा ३०% है। यह दर्शाता है कि भारत के बड़े शहरों के बाहर एक सर्कुलर डिवाइस इकोनॉमी पहले से ही अच्छी तरह से स्थापित हो चुकी है।
ये निष्कर्ष स्मार्टफोन ब्रांड्स, रिटेलर्स, फाइनेंसर्स और प्रोटेक्शन प्रोवाइडर्स के लिए एक बड़े अवसर को दर्शाते हैं कि वे सरल, अधिक पारदर्शी और सुलभ सुरक्षा समाधानों के माध्यम से जागरूकता और इसे अपनाने के बीच के अंतर को कम कर सकें।
सुब्रत पानी, सह-संस्थापक, वनअसिस्ट ने कहा, “यह रिसर्च लोगों की सोच और व्यवहार में एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाती है। आज स्मार्टफोन बातचीत, वित्तीय लेन-देन, कार्य और मनोरंजन, हर चीज़ के लिए बेहद ज़रूरी बन गया है। ऐसे में फोन का गलती से टूट जाना या खराब होना भी बहुत आम बात है। इसके बावजूद, ज़्यादातर लोग हमेशा फोन टूटने का डर मन में रखकर भी बिना किसी सुरक्षा प्रोटेक्शन के ही उसे इस्तेमाल कर रहे हैं।
जैसे-जैसे फोन महंगे हो रहे हैं और लोग उन्हें लंबे समय तक चला रहे हैं, वे पूरे समय निश्चिंत और तनावमुक्त रहना चाहते हैं। इसलिए, इस क्षेत्र की कंपनियों को चाहिए कि वे लोगों की इन तीन चिंताओं को दूर करें: कम कीमत, सहज नियम और सुदृढ़ विश्वास।”
‘द ग्रेट इंडियन स्मार्टफोन प्रोटेक्शन क्राइसिस’ रिपोर्ट के निष्कर्ष भारत के कंज्यूमर टेक्नोलॉजी परिदृश्य के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर सामने आए हैं। ६५ करोड़ से अधिक स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं, उपकरणों की बढ़ती कीमतों और तीन साल से अधिक लंबी मालिकाना अवधि के कारण, फोन की कीमत और उसके लिए प्रोटेक्शन प्लान न लेने के बीच के अंतर ने भारतीय उपभोक्ताओं के वित्तीय जोखिम को काफी बढ़ा दिया है। यह रिपोर्ट स्मार्टफोन ब्रांड्स, रिटेलर्स, बीमा कंपनियों और प्रोटेक्शन प्रोवाइडर्स से एक साथ मिलकर लागत, क्लेम की जटिलता और उपभोक्ता विश्वास से जुड़ी बाधाओं को दूर करने का आह्वान करती है। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि प्रोटेक्शन प्लान को बिक्री के समय केवल एक अतिरिक्त विकल्प के रूप में न देखकर, इसे डिवाइस खरीदने और इस्तेमाल करने की पूरी यात्रा का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाना चाहिए।


