
पुणे, : ‘अभंग’ के जरिए समाज को जागरूक करना महाराष्ट्र की एक पुरानी परंपरा है. डॉ. संजय उपाध्ये ने आधुनिक अभंगसंग्रह विवेक संहिता को एक नए तरीके से बनाया है और इसे समाज तक पहुंचाया है. उन्होने हमें बताया है कि आज के जमाने में कैसे जीना है. इंसान के मन की अंतरात्मा को जगाकर, उन्होने १०१ अभंग रचनाओं के इस संग्रह के जरिए समाज को समझदारी से जीने का रास्ता दिखाने की कोशिश की है. यह राय एमआईटी विश्वशांति विश्वविद्यालय के संस्थापक अध्यक्ष विश्वधर्मी प्रो.डॉ. विश्वनाथ दा. कराड ने दी.
अभंग कविता के रूप में इस्तेमाल करते हुए जाने माने कवि, वक्ता और गप्पाष्टककार डॉ. संजय उपाध्ये के लिखे आधुनिक अभंगसंग्रह विवेक संहिता का विमोचन एमआईटी में विश्वधर्मी प्रो. डॉ. विश्वनाथ दा. कराड के हाथो हुआ है. इस मौके पर उन्होंने अपने विचार रखे.
इस मौके पर डॉ. सुचित्रा कराड-नागरे, कुलपति डॉ. रविकुमार चिटणीस, वैज्ञानिक डॉ.अशोक जोशी, डॉ. दीपक रानडे, गिरीश दाते और डॉ. महेश थोरवे मौजूद थे.
डॉ. विश्वनाथ दा. कराड ने कहा, मेरे साथ काम करते समय अगर डॉ. संजय को कहते है कि मुझे इस टॉपिक पर कोई कविता या गाना चाहिए, तो वे तुरंत उस पर एक कविता बना देते है. इंद्रायणी की आरती, चंद्रभागा की आरती या वाखरी का गाना जैसे उदाहरण है. इससे उनकी गहराई पता चलती है.
इसके अलावा चिंचवड में काशीधाम मंगल कार्यालय में डॉ. संजय उपाध्ये के मी नि कविता कार्यक्रम के दौराना सुहास पोफले, राजाभाऊ गोलंडे, अवधूत कुलकर्णी, विवेक कुंभोजकर और नितिन जोशी ने सपत्नीक आधुनिक कविता संग्रह का विमोचन किया.
इस मौके पर डॉ. संजय उपाध्ये ने कहा, बहुत ही आसान और सीधी भाषा में पढने वालों को उनकी जिंदगी में आने वाली उलझनों, मुश्किलों, निराशाओं वगैरह को दूर करने के तरीके बताए गए हैं. पढनेवाले इस से जरूर सीखेंगे और अपनी और बदले में समाज की जिंदगी का रास्ता रोशन करेंगे.
अगर हमें देश को बचाना है, तो हमें अपनी भाषा को बेहतर बनाना होगा. जिंदगी कविता से ही दिखती है. हमें खुशी से जीने के लिए कविता की तलाश करनी चाहिए. जिंदगी कविता से ही बेहतर बनती है. जिंदगी में सकारात्मक सोच है, नेचर का मजा है, आज के पल में जीना है और अंदर की खुशी ढूंढगी है. कई कवियों ने भावनाओं को शब्दों में पिरोया है. हर पल को त्योहार की तरह मनाएं खुद को ढूंढे और एक हों. इससे हमें जिंदगी की खूबसूरती और मतलब ढूंढने में मदद मिलती है.
कार्यक्रम का संचालन सुहास पोफले ने किया.


