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विश्वगुरु भारत के लिए ध्येयवादी नेतृत्व: ज्ञानर्षि डॉ. विश्वनाथ कराड

शिक्षा को विश्व-पटल पर ले जाने वाले अध्वर्यु: प्रा. डॉ. विश्वनाथ कराड सर

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शिक्षा पद्धति और विश्वशांति के भारतीय प्रारूप (मॉडल) का निर्माण कर उसे सफलतापूर्वक लागू करने वाले ज्ञानर्षि विश्वधर्मी प्रा. डॉ. विश्वनाथ कराड सर के स्वप्नपूर्ति का सुवर्णक्षण यानी यज्ञभूमि रामेश्वर स्थित ‘विश्वधर्मी मानवतातीर्थ भवन’ का 14 नवंबर 2025 को भव्य उद्घाटन समारोह संपन्न हुआ है।
ऐसे दूरदर्शी नेतृत्व का जन्मदिन मंगलवार,  3 फरवरी 2026 को सहर्ष मनाया जा रहा है। इस अवसर पर उनके विश्व कार्य का संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।

 

(प्रा. डॉ. विश्वनाथ कराड सर)

|| शुभं ही कर्म विश्वनाथ: शुभत्व योपपद्यते ||
वैश्विक ध्येय से प्रेरित होकर आरंभ किया गया कार्य शुभकार्य होता है और समस्त वैश्विक शक्तियों का समर्थन पाकर वह सफल होता ही है, यह उक्ति विश्वगुरु भारत के निर्माण में सक्रिय योगदान देने वाले ज्ञानर्षि विश्वधर्मी प्रा. डॉ. विश्वनाथ कराड सर पर अत्यंत सार्थकता से लागू होती है, जिन्हें नियति ने यह विशेष कार्य सौंपा है।औपनिवेशिक मानसिकता से केवल उच्चशिक्षित भारतीय पीढ़ी बनाकर उनके स्वाभिमान व स्वत्व को समाप्त करने वाली शिक्षा पद्धति को बदलकर, भारतीय वैचारिक-सांस्कृतिक-आध्यात्मिक अधिष्ठान वाली शिक्षा पद्धति का निर्माण कर और उसे सफलतापूर्वक अमल में लाते हुए आधुनिकता को संपन्न वैचारिक विरासत का आधार प्रदान करने वाले शिक्षाविद् डॉ. वि. दा. कराड सर को इस अद्भुत कार्य के सम्मान में अमेरिका के साल्ट लेक सिटी में आयोजित वैश्विक शांति सम्मेलन में गौरवान्वित किया गया।
भारत के महान सपूत स्वामी विवेकानंद ने इसी श्रृंखला के सम्मेलन में पूर्व में भारतीय सभ्यता और संस्कृति की दुनिया को पुनः पहचान करवाई थी। उन्हीं स्वामी विवेकानंद का आदर्श सामने रखकर उस संकल्प मार्ग पर चलने वाले प्रा. कराड सर ने आधुनिकता के अंधानुकरण के कारण संस्कृति और दिशा से भटके हुए पश्चिमी समाज के सामने उच्च व आदर्श सांस्कृतिक मूल्यों वाले समरस भारतीय समाज व शिक्षा व्यवस्था का सामर्थ्य स्पष्ट कर भारत का मान अभिमान से ऊंचा किया। इसी उत्तुंग कार्य के लिए अमेरिका की ‘ब्रिघम यंग यूनिवर्सिटी’ ने उन्हें विशेष समारोह में मानद डॉक्टरेट प्रदान की।
मैकाले की पद्धति से पढ़ाई कर मैकेनिकल इंजीनियर बनकर सीओईपी (COEP) जैसे प्रतिष्ठित शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में कार्यरत रहने वाले प्राध्यापक कराड सर के भीतर का शिक्षक अस्वस्थ हो रहा था। किसान परिवार से और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की पृष्ठभूमि वाले मन को समाधान नहीं मिल रहा था। कृत्रिम शिक्षा पद्धति में शिक्षा की आत्मा कहीं खो जाने का खेद था। इसमें बदलाव करने का ध्येय और लकीर की फकीर वाली पद्धति के कारण आने वाली कठिनाइयां एक तरफ थीं, तो दूसरी तरफ इंजीनियरिंग कॉलेजों की सीमित संख्या के कारण प्रवेश न मिलने पर होनहार छात्रों की होने वाली दुर्दशा थी।

“प्राप्तकाल हा विशाल भूधर | सुंदर लेणी तयात खोदा ||”

(वर्तमान समय एक विशाल पहाड़ है, इसमें सुंदर गुफाएं/कलाकृतियां उकेरें) इस ऊर्जावान संदेश को अंगीकार करते हुए एक ध्येयवादी प्राध्यापक के संघर्ष की कहानी का अगला अंक शुरू हुआ। कुछ मित्र अत्यंत निस्वार्थ भाव से साथ आए और महाराष्ट्र के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होने वाले उज्ज्वल अध्याय की शुरुआत हुई। इंजीनियरिंग शिक्षा व गुणवत्ता का मानदंड बने ‘एमआईटी’ (MIT) के साथ-साथ अन्य पाठ्यक्रम शाखाएं पूरे महाराष्ट्र में शुरू हुईं।

शिक्षा के मायके पुणे से उगम पाने वाली यह ज्ञान-विज्ञान-अध्यात्म आधारित शिक्षा-गंगा आज अनेक शिक्षण संस्थाओं सहित – एमआईटी विश्वशांती विश्वविद्यालय पुणे, एमआईटी एडीटी विश्वविद्यालय पुणे, अवंतिका विश्वविद्यालय उज्जैन, एमआईटी शिलांग विश्वविद्यालय और एमआईटी विश्व प्रयाग विश्वविद्यालय सोलापूर, इन पांच स्वतंत्र विश्वविद्यालयों (ज्ञानपीठ) द्वारा आधुनिक ज्ञान जनसामान्य तक पहुँचा रही है।
“उदारचरितानाम् तु, वसुधैव कुटुम्बकम” उक्ति को सार्थक करते हुए वैश्विक छात्र आज इन शिक्षण संस्थाओं में आकर भारतीय आध्यात्मिक अधिष्ठान वाली कालसुसंगत आधुनिक शिक्षा ले रहे हैं, साथ ही लाखों पूर्व छात्र हजारों नामांकित उद्योगों और व्यवसायों में देश-विदेश में भारत का नाम रोशन कर रहे हैं।
राष्ट्रधर्म पूजक पिता वैकुंठवासी दादाराव कराड और बड़ी बहन त्याग मूर्ति वैकुंठवासी प्रयाग अक्का कराड के संस्कारों की भट्ठी में तपकर तैयार हुए यह ‘सरस्वती रत्न’ अर्थात प्राध्यापक विश्वनाथ कराड सर हैं। शिक्षा क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव के बाद भारतीय ज्ञान-विज्ञान-अध्यात्म की महानता को समझने वाले इस दूरदर्शी व्यक्तित्व ने दुनिया का सबसे ऊंचा गुंबद, वह भी संत ज्ञानेश्वर माउली के नाम पर बनाने का ध्येय लिया।
‘एकम सत विप्रा बहुधा वदंती’ का आंतरिक ज्ञान रखने वाले प्रा. कराड सर ने संकल्पना-रूपरेखा-निर्माण ऐसी त्रिमितीय भूमिका निभाते हुए, फिर भी कर्ता का श्रेय स्वयं न लेते हुए विश्वात्मक ईश्वर को देते हुए, ‘तत्वज्ञ संत श्री ज्ञानेश्वर विश्वशांती गुंबद व ग्रंथालय’ इस अद्भुत ऐतिहासिक वास्तु का निर्माण किया। यह विश्व का सबसे ऊंचा विश्वशांती गुंबद है और यह संपूर्ण भारतवासियों के लिए अभिमान की बात है।
श्रीक्षेत्र आलंदी में ऊर्जा केंद्र श्री ज्ञानेश्वर माउली की सत्प्रेरणा से शुरू हुआ भागवत धर्म सेवा संकल्प एक अत्युच्च गुंबद के रूप में दुनिया को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। आलंदी में इंद्रायणी नदी पर घाट का सुंदर निर्माण, धार्मिक स्थल को ज्ञानस्थल बनाने वाला 84 फुटी कोलेजियम, संत तुकाराम महाराज की महानता दर्शाने वाली 100 फुट ऊंची कमान और आषाढी-कार्तिकी एकादशी पर चलने वाली सद्भावी वारकरी सेवा, वाखरी स्थित श्री समर्थ वारकरी महावीर कुस्ती स्पर्धा और अन्नदान यज्ञ इसके कुछ प्रतिनिधि उदाहरण हैं।
महर्षि वेदव्यास को आशीर्वाद देकर जहाँ श्री माता सरस्वती देवी प्रकट हुईं, उस बद्रीनाथ के पास माणा गाँव में सरस्वती नदी के तट पर केवल 63 दिनों में खड़ा किया गया नयनरम्य ‘श्री सरस्वती धाम देवालय’ यानी प्रा. डॉ. वि. दा. कराड सर द्वारा अनेक प्रतिकूलताओं पर मात करते हुए दृढ़निश्चय और सत्य संकल्प के ध्येय को पूर्ण करने का प्रस्तुत किया गया एक पाठ ही है।
अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर का सुझाया गया भव्य प्रारूप, नेपाल में भूकंप पीड़ितों के लिए बनाए गए संत ज्ञानेश्वर-संत तुकाराम नगर में 120 टिकाऊ और सुंदर घर, बिहार व देश के अनेक स्थानों पर आई प्राकृतिक समस्याओं और आपदाओं में मदद के लिए तत्पर हाथ, संत ज्ञानेश्वर व संत तुकाराम व्याख्यानमाला के माध्यम से ज्ञान प्रसार का अखंड चल रहा यज्ञ, विश्वराज बाग स्थित श्री विश्वरूप दर्शन मंदिर तथा सुप्रसिद्ध राजकपूर मेमोरियल, रामेश्वर रुई स्थित राम-रहीम सेतु ऐसी उत्तम कार्यशृंखला जिन्होंने अपने स्वकर्तृत्व से गूंथी, वे भारतीय रत्न प्रा. डॉ. कराड सर समस्त विश्व के लिए एक प्रभावशाली दार्शनिक ही हैं।

प्रेरक : सूचकश्चेव वाचको दर्शकस्थता ।
शिक्षको बोधकश्चेव षडेते गुरव : स्मृत : ।।
इन छह रत्नों से आभूषित कराड सर को काशी विश्वनाथ धाम, वाराणसी में अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से गौरवान्वित किया गया। काशी विद्वत परिषद की ओर से “विश्वशांती विद्यारत्न”, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से “विश्वशांती उद्गाता” तथा “समर्पित जीवन गौरव पुरस्कार”, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का “संस्कृत श्री”, इन सम्मानों से अलंकृत प्रा. डॉ. विश्वनाथ कराड सर का कृतज्ञता सत्कार समारोह राष्ट्रीय शिक्षक दिवस, मंगलवार दिनांक 5 सितंबर 2023 को उनकी ही संकल्प सिद्धि, विश्व के सबसे ऊंचे विश्वशांती गुंबद, विश्वराज बाग, लोणी कालभोर, पुणे में संपन्न हुआ।
शैक्षणिक-सांस्कृतिक-आध्यात्मिक क्षेत्र की गहरी समझ, उत्तुंग ध्येय और ध्येयपूर्ति की लगन, संसाधनों की उपलब्धता, विद्वता का अधिष्ठान, तत्वज्ञ संत ज्ञानेश्वर-संत तुकाराम तथा स्वामी विवेकानंद की विचार साधना, औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर विश्वगुरु भारत के लिए अथक परिश्रम व सहयोग, देश के प्रति निष्ठा और समाज के प्रति आस्था; इन अष्टांग सद्गुणों पर जिनका जीवन और कर्तृत्व शान से और उतनी ही विनम्रता से खड़ा है, ऐसे प्रा. डॉ. वि. दा. कराड सर को विशेष सम्मान पत्र देकर विदेशी विश्वविद्यालयों, विशेषकर अमेरिका, इंग्लैंड, इंडोनेशिया के विश्वविद्यालयों द्वारा, और उनमें भी मुख्य रूप से अमेरिका स्थित “ब्रिघम यंग यूनिवर्सिटी”, ‘उटा वैली यूनिवर्सिटी’, ‘वेस्टमिंस्टर यूनिवर्सिटी’ के साथ-साथ विभिन्न धर्मों के, विशेषकर बहाई-मुस्लिम-जैन-ईसाई-यहूदी-पारसी और हिंदू धर्मगुरुओं की ओर से दिया गया सम्मान और आशीर्वाद एक हृदयस्पर्शी पारिवारिक समारोह ही था।
इसी अद्भुत कार्य संकल्पना की अगली भव्य वास्तुरचना यानी यज्ञभूमि रामेश्वर, लातूर में साकार होने वाला 270 फुट लंबा और 127 फुट चौड़ा भारत का एकमेवाद्वितीय ‘विश्वधर्मी मानवतातीर्थ भवन’ है। भारतीय संस्कृति, परंपरा का वैश्विक दर्शन कराने वाला, सांस्कृतिक-आध्यात्मिक शिक्षा का केंद्र बनने वाला यह भवन भारत की ओर से संपूर्ण विश्व को दिया गया अद्वैत से एकात्मता का मानवीय संदेश ही है।
व्यक्तियों के कल्याणार्थ विश्वधर्मी प्रा. डॉ. कराड सर द्वारा आयोजित महायज्ञ में हम सभी का अपने कार्य-कर्तव्य पूर्ति की समिधा अर्पण करना हम सभी का सौभाग्य है।
इस विश्वात्मक संदेश देने वाले पवित्र कार्य के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले विश्वधर्मी प्रा. डॉ. विश्वनाथ कराड सर के जन्मदिन पर आपकी शुभकामनाएँ और शुभाशीर्वाद प्राप्त हों, यही विनम्र भावना है।

आइए, हम सब इस वैश्विक कार्य में सहभागी हों और कृतज्ञता के ऋण में ही अपना जीवन समृद्ध करें।
इस निमित्त उनके दूरदर्शी नेतृत्व को कृतज्ञतापूर्वक मानवंदना। आने वाले समय में हिंदवी स्वराज्य की संकल्पना लेकर विश्वगुरु भारत के साकार होते समय ऐसे ही कीर्ति मानांकन स्थापित हों, इसके लिए उनके दीर्घायु और आरोग्य के लिए अभिष्टचिंतन और प्रार्थना।
वंदे भारत |

|| तेजस्वीनावधीतमस्तु , मा विद्विषावहै ||

डॉ. रत्नदीप रा. जोशी
कुलसचिव, माईर्स, एमआईटी शिक्षण संस्था समूह, पुणे, भारत

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